रविवार, २८ सप्टेंबर, २०२५

एक सुलझाओ दूजी तैयार....-कलाम अहमद खान



 एक सुलझाओ दूजी तैयार

है सर पर नाच रही उलझन....


एक जान और लाख झमेले

निपटे कैसे इनसे अकेले

हो गए अस्थिपंजर ढीले

भगवन आकर इनको कसले


चारों तरफ टेंशन ही टेंशन

फिर कोई कैसे रहे अटेंशन

बिना पैसों के काम न होते

कितना बढ़ गया करप्शन


मानव मन का विवेक मरा तो

करते दानव जैसा आचरण

एक सुलझाओ दूजी तैयार

है सर पर नाच रही उलझन....


एक पद और हजार आवेदन

बेकारों से भरा शहर है

मुश्किल है दो समय का भोजन

उस पर महंगाई का कहर है


खानेवाले जीव अनेकों

कमानेवाली एक ही जान

तंगी में ही गुजारा होता

कैसे होगा फिर समाधान


घर घर में बजते ही रहेंगे

जब टकराए आपस में बरतन

एक सुलझाओ दूजी तैयार

है सर पर नाच रही उलझन....


-कलाम अहमद खान

भिवापुर, जि. नागपुर


शनिवार, २७ सप्टेंबर, २०२५

हैं दोनों मेरे हाथ सलामत....-कलाम अहमद खान


                       धन-आभूषण लूटनेवाले

हैं दोनों मेरे हाथ सलामत....


चुरा सके न कोई बुद्धि

हुनर हाथ का चल जाएगा

कोशिशों की झड़ी लगेंगी

परिश्रम का फल आएगा


जो कुछ भी है खोया मैंने

कर लूंगा मेहनत से हासिल

तब तक पांव नहीं थकेेंगे

जब तक मिल न जाए मंजिल


निंदा चाहे जितनी कर लो

रंग लाएगी मेरी मेहनत

धन-आभूषण लूटनेवाले

हैं दोनों मेरे हाथ सलामत....


वो ही महान धनी जगत में

ज्ञान को जिसने धन माना

घटे नहीं और बढ़ता जाए

चाहे लुटाओ मनमाना


सद्गुण कोई चुरा न पाए

कौन चुराए सदाचरण

यही तो सच्ची दौलत है

जो साथ रहेगी आमरण


दुनिया याद रखेगी मुझको

इन हाथों की देख करामत

धन-आभूषण लूटनेवाले

हैं दोनों मेरे हाथ सलामत....


                            -कलाम अहमद खान

भिवापुर, जि. नागपुर


डॉ.मुबारक कुरैशी यांना राष्ट्रीय सेवा योजना ,रातुम नागपूर विद्यापीठाचे 'उत्कृष्ट कार्यक्रम अधिकारी' पुरस्कार

 


शब्दशिल्प/भंडारा_ श्री सुदामा शिक्षण संस्था, तुमसर द्वारा संचालित गोपिकाबाई भुरे महिला महाविद्यालय, तुमसर येथील राष्ट्रीय सेवा योजना कार्यक्रम अधिकारी प्रो.डॉ. मुबारक कुरैशी यांना  राष्ट्रीय सेवा योजना विभाग,  राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपूर विद्यापीठ, नागपूर तर्फे महाविद्यालय स्तरावर राष्ट्रीय सेवा योजना उपक्रमामध्ये उत्कृष्ट कार्य केल्याबद्दल सत्र 2024 -25 साठी "उत्कृष्ट राष्ट्रीय सेवा योजना महिला कार्यक्रम अधिकारी" म्हणून विद्यापीठ स्तरीय पुरस्काराने सन्मानित करण्यात आले. राष्ट्रीय सेवा योजना स्थापना दिनानिमित्त 24 सप्टेंबरला आयोजित कार्यक्रमात, कार्यक्रमाचे अध्यक्ष  राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपूर विद्यापीठ, नागपूर चे  कुलगुरू मा. डॉ. माधवी खोडे चवरे यांच्या शुभहस्ते व प्र- कुलगुरू मा. डॉ. सुभाष कोंडावार तसेच संचालक, राष्ट्रीय सेवा  योजना विभाग राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपूर विद्यापीठ ,नागपूर डॉ .सोपान देव पिसे यांच्या प्रमुख उपस्थितीत प्रो. डॉ. मुबारक कुरेशी यांचे मानचिन्ह व प्रमाणपत्र प्रदान करून गौरव करण्यात आले.

 सदर कार्यक्रमातच गोपिकाबाई भुरे महिला महाविद्यालय , तुमसरला राष्ट्रीय सेवा योजनाच्या उत्कृष्ट कार्याबद्दल 'उत्कृष्ट महाविद्यालय' पुरस्कार सुद्धा मिळाला. महाविद्यालयातर्फे हा पुरस्कार प्राचार्य डॉ.युवराज सेलोकर यांनी स्वीकारला. तसेच महाविद्यालयातील कु. आकांक्षा सांगोळे हिला 2024- 25 उत्कृष्ट स्वयंसेविका पुरस्काराने सन्मानित करण्यात आले. 

प्रो. डॉ. मुबारक कुरैशी यांनी आपल्या यशाचे श्रेय श्री सुदामा शिक्षण संस्था, तुमसरचे संस्थापक, मा. श्री नारायणरावजी तितीरमारे , सचिव, मा. श्री प्रमोदरावजी तितीरमारे, अध्यक्ष, मा. श्री शरदरावजी तितीरमारे, उपाध्यक्ष  मा. श्री विनोदजी तितीरमारे तसेच महाविद्यालयाचे प्राचार्य डॉ. युवराज सेलोकर व महाविद्यालयातील  शिक्षक व शिक्षकेतर कर्मचारी वर्ग आणि महाविद्यालयीन राष्ट्रीय सेवा योजना पथक यांना दिले.

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परिचय

नाव : डॉ. मुबारक कुरैशी

 प्रोफेसर व इतिहास विभाग प्रमुख गोपिकाबाई भुरे महिला महाविद्यालय, तुमसर, जि. भंडारा

 शिक्षण : बीएससी( गणित), 

एम ए (इतिहास) नागपूर विद्यापीठ टॉपर 1992 , चार सुवर्णपदक व तीन रोख बक्षीस,एम ए (इंग्रजी) , एम फिल (इतिहास)

 पी एच डी (इतिहास)- मार्च 2004

पीएचडी चे विषय : "सत्रहवी शताब्दी के भक्ती आंदोलन मे विकसित हिंदू- मुस्लिम समन्वय का महाराष्ट्र पर प्रभाव "

 पीएचडी मार्गदर्शक,(2006 पासून, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपूर विद्यापीठ, नागपूर 

 पीएचडी संशोधन मार्गदर्शन: 1)मार्गदर्शनाखाली 6 संशोधकांना पीएचडी पदवी बहाल    

2)सध्या मार्गदर्शनाखाली 6 पीएचडी संशोधकांचे कार्य प्रगतीवर

ग्रंथ प्रकाशन : 

1) भारताचा इतिहास ( प्रारंभा पासून ते इ. 1525 पर्यंत)

2) भारताचा इतिहास (इ.स. 1526 पासून ते 1761 पर्यंत)

 3)भारताचा इतिहास (इ.स. 1764 ते 1885)

4) 17 वी सदी के महाराष्ट्र मे भक्ति आंदोलन 

सन्मान व सत्कार :1) "श्री समर्थ रामदासी मठ, भंडारा" या शोधनिबंधाकरिता श्री समर्थ रामदासी मठ ,भंडारा द्वारे सत्कार

 तसेच 2004 ला पीएचडी पदवी प्राप्त केल्याबद्दल सत्कार 

2)हिंदू- मुस्लिम सहिष्णुता या शोध विषयावर पीएचडी केल्याबद्दल भारतीय सामाजिक विज्ञान व लोकसाहित्य संशोधन संस्था ,परभणी यांच्यातर्फे सत्कार 

3)विदर्भ हिंदी साहित्य संमेलन, नागपूर यांच्यातर्फे' महिला सन्मानपत्र' देऊन सन्मान 4)"कॉन्ट्रीब्युशन ऑफ वुमन सेंट इन भक्ती मुव्हमेंट ऑफ मीडियेवल महाराष्ट्र" या विषयावर उत्कृष्ट शोध निबंध लिहिल्याबद्दल सेंट्रल इंडिया जर्नल ऑफ हिस्टॉरिकल अँड आर्किऑलॉजिकल रिसर्च पन्ना, मध्य प्रदेश द्वारा सन्मान

* "एमिनेन्ट  रिसर्चर अवॉर्ड": इंटर डिसिप्लिनरी इंटरनॅशनल कॉन्फरन्स ऑन "रायझिंग ऑफ गलोबल इंडिया -एस्पिरेशन पॉसिबिलिटीज अँड चेंजेस, दुबई येथे " समाज विज्ञानाच्या क्षेत्रात उत्तम शोध कार्य केल्याबद्दल ॲमिनेन्ट रिसर्च अवॉर्ड" (23 नोव्हेंबर 2023)

*  शोध निबंध प्रस्तुती : 1)भगवानदास गुप्त स्मृती शोध संस्थान, (झाशी ,उ. प्र.)

* 2)  स्वराज्य संस्था संचालनाय संस्कृती विभाग, मध्य प्रदेश शासन , भोपाल (म. प्र.)

*  3)माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय  स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, खंडवा (म. प्र.) 

* एस एस जैन सुबोध महाविद्यालय, जयपुर, राजस्थान

* छत्रसाल शासकीय  स्नातकोत्तर महाविद्यालय , पन्ना( म.प्र.)

*  भारतीय सामाजिक विज्ञान व लोकसाहित्य संशोधन संस्था 

* 

प्रकाशित शोधनिबंध : जवळपास 50 राष्ट्रीय- आंतरराष्ट्रीय स्तरावर शोधनिबंध प्रकाशित 


सदस्यत्व : 1)अध्यक्ष, ऐतिहासिक धरोहर शोध यात्रा (भंडारा -गोंदिया जिल्हा)

 2)सदस्य ,अखिल महाराष्ट्र इतिहास परिषद 

3)सदस्य, मध्य प्रदेश इतिहास परिषद भोपाल 

4)सदस्य, ग्रीन हेरिटेज बहुउद्देशीय सामाजिक विकास संस्था, भंडारा 5)सदस्य इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी

गुरुवार, २५ सप्टेंबर, २०२५

कालचक्र थमता नहीं है....- कलाम अहमद खान

 कोई आए या जाए कोई

कालचक्र थमता नहीं है....


दिन-रात का वही फसाना

धूप-छांव की वही कहानी

कहीं पे सूखा,कहीं बाढ़ है

मर्जी की पानी की रवानी


जिसने अमावस का तम देखा

पूनम की रश्मि में नहाया

मिलन का जिसने मधुमास देखा

विरह के आसू रोक न पाया


सुख-दुख तो हैं आने जाने

एक जगह कोई रमता नहीं है

कोई आए या जाए कोई

कालचक्र थमता नहीं है....


नवागतों का स्वागत करने

शाखा त्यागे पीले पात

दादा की अर्थी उठे तो

झूले में पोता नवजात


कहीं कबर पे होती फातिहा

कहीं गंगा में राख बहे

आखिर कह गए अलविदा

जो भी अपने साथ रहे


तन की धर्मशाला में आत्मा

सदा के लिए ठहरता नहीे है

कोई आए या जाए कोई

कालचक्र थमता नहीं है....



- कलाम अहमद खान,नागपुर

संवाद : ९६५७३४७६८८



बुधवार, २४ सप्टेंबर, २०२५

भगवान मैंने कनक न मांगा--कलाम अहमद खान

 





                   भगवान मैंने कनक न  मांगा 
                    तांबा, कांसा चल जाएगा...


जितनी मेरी औकात है जानी

दिया तुमने उससे ज्यादा

किंतु महंगाई भी बढ़ी है

आय सीमित है, मिले न ज्यादा


श्रद्धा मेरी अपार है किंतु

महंगे हो गए पूजा-दर्शन

इएलिए धन और भी देना

शेष फिर तुझे ही अर्पण


इतना दे दे इस निर्धन को

कामकाज न टल पाएगा

भगवान मैंने कनक न मांगा

तांबा, कांसा चल जाएगा...


स्वर्ग की तेरे परी न चाहूं

पर संगिनी खरी ही देना

पतझर से मुझे क्या लेना है

देना जो हरीभरी ही देना


मैं न मांगू ज्यादा तुझसे

और करूं एक वादा तुझसे

जो दिया स्वीकार करूंगा

शिकवा मैं न करूंगा तुझसे


किंतु वधू ऐसी ही देना

देखनेवाला जल जाएगा

भगवान मैंने कनक न मांगा

तांबा, कांसा चल जाएगा...

-कलाम अहमद खान

भिवापुर, जि. नागपुर


शनिवार, २० सप्टेंबर, २०२५

तंगहाली-कलाम अहमद खान




              किसी लाइलाज संक्रामक रोग की तरह

उनके हाथों को आदत है

दुसरों के भरे हुए जख्मों को कुरेदने की

और हमारे लक्ष्य की ओर बढ़नेवाले कदमों को 

शाप है

बीच सफर में कलम कर दिए जाने का...!


झुग्गियों की तकदीर में है

कारखाने की चिमनी से निकलने वाला

जहरीला धुआं...और अंधियारा

मजदूरों का खून चूस कर मदहोश है

रोशनाई में जगमगानेवाले एअरकंडिश्नर बंगले...


मजदूर हो या किसान

कितना भी बहाए पसीना

मेहनत का सही दाम नहीं मिलता 

मौसम ऐसे बैरी हो गए हैं

खेतों में पहले जैसा अनाज नहीं उगता


रेहन रखी मुट्ठियां या अंगूठे

कुछ दे कर छुड़वा नहीं सकते

दूसरों के लिए

आलिशान बंगले बनानेवाले मजदूर

खुद का झोंपड़ा भी खड़ा नहीं कर सकते...


खूब छले गए,

मुफलिसी और शोषकों के दो पाटों में

पीसे गए, 

फिर भी जी रहे है तंगहाली में

नाकाबंदी भेद कर

पूंजीपतियों से जंग लड़ कर

कैसे रोटी दे बच्चों की थाली में...?

                          -कलाम अहमद खान

२५ डी. आदर्श नगर,नागपुर

संवाद : ९६५७३४७६८८

पौधारोपण -कलाम अहमद खान

 पौधारोपण 



आनेवाले नस्ल के लिए 

पौधारोपण करना साथी....


जो दादा-परदादा ने लगाए

हम उन पेड़ों के फल खाए

हम आज तो पेड़ लगाकर

पुरखों का कुछ कर्ज चुकाए


देखो पेड़ सयाने कितने

कार्बन लेकर आक्सीजन देते

लेकिन मानव बहुत स्वार्थी

बेरहमी से कत्ल कर देते


पेड़ों के उपकार बहुत हैं

कभी न उनको भूलना साथी

आनेवाले नस्ल के लिए 

पौधारोपण करना साथी....


धूप से बेजार पथिकों को

पेड़ ही शीतल छाया देते

जो भी इनकी शरण में आया

सब की झोली भर देते


पेड़ों से पर्यावरण संतुलन

और मानव का जीवन खुशहाल

पेड़ न बचेंगे धरती पर तो

होगा चारों तरफ अकाल


अवसर मिले तब जनता को

पेड़ों का महत्व बताना साथी

आनेवाले नस्ल के लिए 

पौधारोपण करना साथी....


-कलाम अहमद खान

भिवापुर, जि. नागपुर


शुक्रवार, १९ सप्टेंबर, २०२५

दिल के पीसी से मेरे प्यार का--कलाम अहमद खान




 दिल के पीसी से मेरे प्यार का 

पेन ड्राइव अटैच किया होता

बिना एरर के प्यार मिलता 

अगर प्यार से मैच किया होता


तेरे जिंदगी के मोबाइल में 

प्यार ही प्यार बेलेंस होता

अगर मेरे प्यार का वाउचर 

तूने स्क्रैच किया होता


मैसेज का चलन बढ़ा तो 

प्यार के खत लिखना ही भूल गए

तूने भी दिल का हाल लिखकर

हमें डिस्पैच किया होता


वैसे तो हम पीते नहीं हैं 

मगर जरासा चख लेते

मेरे नाम इन रसीले होठों का 

अगर स्क्वॉच किया होता


हमारे चेहरे से तो हर दम 

प्यार ही प्यार झलकता है

फेस टू फेस कभी गौर से 

अगर तुमने वॉच किया होता




-कलाम अहमद खान

भिवापुर, जि. नागपुर


बुधवार, १७ सप्टेंबर, २०२५

लक्ष्मी जब रूठ जाती है...- कलाम अहमद खान,


 लक्ष्मी जब रूठ जाती है

संगी-साथी छूट जाते हैं...


जेब में जब तक पैसा होगा

यार भी यारी निभाएंगे

मेहफिलों का दौर चलेंगा

सब रिश्तेदारी निभाएंंगे


तरह तरह की कस्में होंगी

तहर तरह के वादे होंगे

कोई कर्ज या उधार मांगेगा

पास तेरे जब रुपए होंगे


ऐसे वैसे लोग मतलबी

बहाने से लूट जाते हैंं

लक्ष्मी जब रूठ जाती है

संगी-साथी छूट जाते हैं...


जब गर्दिश में होंगे तारे

द्वार तेरा भूलेंगे सारे

सूनी मेहफिल-खाली जाम

आएंगा न फिर कोई काम


पछताने से क्या हासिल

चिडिय़ां जब चुग जाए खेत

फिर से अपने कदम जमा

समझ जमाने के संकेत


सच तभी सामने आता

जब झूठ के पर्दे उठ जाते हैं

लक्ष्मी जब रूठ जाती है

संगी-साथी छूट जाते हैं...



- कलाम अहमद खान,नागपुर

संवाद : ९६५७३४७६८८


रविवार, १४ सप्टेंबर, २०२५

जो करना है आज करें - कलाम अहमद खान,



 जो करना है आज करें

कल पे न टाले काम कोई...


आलस तो बुरी बला है

जिसने किया उसकी हानि

वही तो कामयाब हुआ

वक्त की जिसने कीमत जानी


मौका जो पहचान गया

क्या करना है-जान गया

तत्परता से काम पे लागे

फिर तो उसके भाग ही जागे


सफलता उसके कदम चुमे

हो चाहे रहीम या राम कोई 

जो करना है आज करें

कल पे न टाले काम कोई....


आत्मविश्वास न ढहने दे

कोशिश जारी रहने दे

लत नशे की न लगने पाए

अच्छाई अपनाते जाए


सकारात्मकता साथ न छोड़े

लक्ष्य आंखों से न ओझल हो

जीतना है तो लडऩा होगा

एक हार से न घायल हो


बिन मेहनत के दुनियां में

होता किसी का नाम नहीं

जो करना है आज करें

कल पे न टाले काम कोई....



- कलाम अहमद खान,नागपुर

संवाद : ९६५७३४७६८८

शनिवार, १३ सप्टेंबर, २०२५

झूमे कैसे खुशियों से...- कलाम अहमद खान,


 झूमे कैसे खुशियों से

जब मनमयूरा घायल हो...


कांटें न बोए उनके पथ में 

किसी का न दिल दुखाया

दीं लोगों ने पीड़ा ऐसी

उपाय न जिसका कर पाया


विवेकहीनता ये कैसी है

जज्बातों से हर कोई खेला

औरों का भला करने ही

मैंने हर संकट को झेला


भले मानस का जीना मुश्किल

रीत जहां की स्वार्थ-छल हो

झूमे कैसे खुशियों से

जब मनमयूरा घायल हो...


अपना अपना सब कहते है

जब करने की बारी आई

इसने उसने मुंह छिपाया

काम न कोई यारी आई


पीड़ा जिसने भेंट स्वरूप दीं

मैंने भी आभार है माना

असली चेहरा सामने आया

तब दुनिया को पहचाना


किंतु फिर भी सहना है

हृदयवेदना अगर प्रबल हो

झूमे कैसे खुशियों से

जब मनमयूरा घायल हो...



- कलाम अहमद खान,नागपुर

संवाद : ९६५७३४७६८८


शुक्रवार, १२ सप्टेंबर, २०२५

दुनिया में सुख से जीने को- कलाम अहमद खान,नागपुर

 


दुनिया में सुख से जीने को

प्रभु,दो समय की रोटी देना...


फूटपाथ पर रहनेवाला

कोई श्रमिक भूखा न सोये

तड़प तड़प कर भूख से

यहां कोई बच्चा न रोये


मेहनत से डरते नहीं है

हाथ कभी रहे न खाली

रोजी-रोटी बनी रही तो

हम भी मनाए होली-दिवाली


हमें महल की आस नहीं है

कुटिया हक की छोटी देना

दुनिया में सुख से जीने को

प्रभु,दो समय की रोटी देना...


मजदूरी में जीवन बीता

हम तो पढ़-लिख न पाए

इतनी देना आय हमें कि

बच्चों को हम स्कूल भिजवाए


साक्षर होंगे-हुनर सिखेंगे

पेट अपना भर पाएंगे

अपने हाथों अपना भविष्य

वे स्वयं ही लिख पाएंगे


मजदूरों के बच्चों को भी

कामयाबी की चोटी देना

दुनिया में सुख से जीने को

प्रभु,दो समय की रोटी देना...



- कलाम अहमद खान,नागपुर

संवाद : ९६५७३४७६८८

गुरुवार, ११ सप्टेंबर, २०२५

तुझे जब देखती हूँ

 तुझे जब  देखती हूँ  मैं महक  जाता है  दिल मेरा

ज़रा सी देर को उस पल बहक जाता है दिल मेरा


किया करते हो गैरों से कभी तुम बात जो हंसकर 

कहूँ  क्या मैं तुम्हें जानां, दहक  जाता है दिल मेरा




                   Rajani Tataskar


राज्यस्तरीय उत्कृष्ट साहित्य पुरस्कार २०२४ साठी पुस्तके पाठविण्याचे आवाहन*

 *मराठी बालकुमार साहित्य सभा कोल्हापूर संस्थेच्यावतीने राज्यस्तरीय उत्कृष्ट साहित्य पुरस्कार २०२४ साठी पुस्तके पाठविण्याचे आवाहन*



शब्दशिल्प/कोल्हापुर_मराठी बालकुमार साहित्य सभा, कोल्हापूर यांच्यामार्फत दरवर्षी पुस्तकांसाठी बालसाहित्य पुरस्कार दिले जातात. याही वर्षी पुरस्कारासाठी बालसाहित्य मागविण्यात येत आहे. खालील *पाच* साहित्य प्रकारातील पुस्तके पात्र असतील. 

१) बाल कथासंग्रह 

२) बालकविता संग्रह 

३) बालनाटिका/एकांकिका/   नाट्यछटा

४) बालकादंबरी

५) संकीर्ण बालासाहित्य

६) उत्कृष्ट प्रकाशक पुरस्कार (या पुरस्कारासाठी सदर वर्षातील बालसाहित्यातील एकूण प्रकाशित पुस्तके पाठवावीत. संख्या व गुणवत्ता या निकषांवर निवड केली जाईल.) 

१ जानेवारी, २०२४ ते ३१ डिसेंबर, २०२४ या कालावधीत पुस्तके प्रकाशित झालेली असावीत. पुस्तकाची पहिली आवृत्ती असावी, पुस्तकाच्या वर्सो पेजवर (दोन नंबरचे पान) तारीख, नाव अथवा इतर मजकुरात खाडाखोड नसावी. माहिती चिकटवलेली नसावी.  

*पुरस्काराचे स्वरूप रोख रक्कम, सन्मानपत्र, सन्मानचिन्ह, शाल व श्रीफळ असे राहील*.

       तरी *महाराष्ट्रातील आणि महाराष्ट्र बाहेरील मराठी बालसाहित्यिकांनी* या राज्यस्तरीय पुरस्कारासाठी आपल्या साहित्यकृतीच्या २ प्रती,अल्पपरिचय आणि पासपोर्ट आकारातील फोटो पाठविण्याचे आवाहन संस्थेच्या वतीने करण्यात येत आहे. तसेच निकालाविषयी वारंवार चौकशी करू नये. निकाल जाहीर होताच सन्माननीय साहित्यिकांना व्हॅटसप ग्रुप द्वारे कळवले जाईल.

पुस्तके पाठवण्याची अंतिम तारीख-३१ ऑक्टोबर, २०२५ 

*पुस्तके पाठवण्याचा पत्ता : -  कार्याध्यक्ष सौ. नसीम जमादार* 

*2386, डी वाॅर्ड*

 *तोरस्कर चौक, जुना बुधवार पेठ, नावेच्या कारखान्याजवळ कोल्हापूर*

*पिन-416002*

*मोबा. 8275918769*

*8459876007*

पुस्तके वरील पत्त्यावर फक्त पोस्टानेच पाठवावीत

*१) अध्यक्ष - डॉ. श्रीकांत पाटील  9834342124*

*२)उपाध्यक्ष : - श्री. परशराम आंबी 9421203732*

*३)कार्यवाह - श्री.संजय कळके 888873738*

बुधवार, १० सप्टेंबर, २०२५

समग्र साहित्यकृतींचा घेतलेला अभ्यासपूर्ण आढावा

 


पुस्तकाचे नाव- समग्र साहित्यकृतींचा रसग्रहणात्मक अभ्यास

लेखक - सचिन बेंडभर

प्रकाशक - निशिराज पब्लिकेशन , पुणे

पाने - 208

किंमत - 455 रूपये

मुखपृष्ठ - तौफिक बागवान

आवृत्ती -जानेवारी 2025

परिचय कर्ता. प्रा कुंडलिक शांताराम कदम.

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समग्र साहित्यकृतींचा घेतलेला अभ्यासपूर्ण आढावा

   युवा साहित्यिक सचिन बेंडभर यांनी कथा, कादंबरी, कविता,ललित, बालसाहित्य, अनुवाद  या प्रकारात विपुल असे लेखन केले आहे. साहित्य क्षेत्रात त्यांचा मोठा मित्रपरिवार आहे. अनेक साहित्यिक भेटी दरम्यान त्यांना पुस्तक भेट देत असत.एखाद्या लेखकाने पुस्तक दिल्यावर ते पुस्तक ते आवर्जून वाचतात.केवळ ते पुस्तक वाचून थांबत नाहीत तर त्यावर सुंदर अशी सविस्तर प्रतिक्रिया देतात. त्या पुस्तकातील चांगल्या बाबी त्या वाचकासमोर आणतात.

       एखाद्या लेखकाने पुस्तक दिल्यावर ते वाचून त्यावर प्रतिक्रिया देणे हा सचिन सरांचा एक चांगला उपक्रम आहे.  यातून नवीन लिहणाऱ्या हातांना प्रेरणा मिळत असते. पुस्तक वाचत असताना त्या पुस्तकातून लेखकाला काय सांगायचे आहे, समाजाला ते पुस्तक कसं उपयुक्त आहे याबद्दल ते सविस्तर त्या पुस्तकाबद्दल लिहीत असतात.  त्यांनी लिहलेला परिचय  वाचल्यावर   इतर वाचकांना ते पुस्तक वाचण्याची आवड निर्माण होत असते.

     ते केवळ हा परिचय लिहून थांबत नाहीत तर फेसबुकवर वाचन चळवळ वाढवणारा वाचनसाखळी समूह आहे. त्या समूहाचे सतरा हजार सभासद आहेत. त्या वाचनसाखळी समूहावर त्यांनी लिहलेले परीक्षण पोस्ट करतात.अशा पद्धतीने अनेक वाचकापर्यंत हे पुस्तक जात असते. त्यांनी आतापर्यंत बहात्तर पुस्तक परीक्षण लिहले आहेत. ते सर्व पुस्तक परिचय या पुस्तकात लिहले आहेत.

मराठी वाचकांना एकत्रित बहात्तर पुस्तक परिचय या यात वाचायला मिळणार आहे.

त्यांच्याकडे विविध प्रकारची पुस्तके परीक्षण करण्यासाठी येत असतात. कथा, कविता, कादंबरी, बालसाहित्य, आत्मचरित्र, अनुवाद या विविध प्रकारच्या पुस्तकाबद्दल एकत्रित माहिती या एकाच पुस्तकात असल्याने हे पुस्तक मराठी वाचकांना एक पर्वणीच आहे.

      पुस्तक परिचय लिहताना अगदी बारीकसारीक तपशील त्यात लिहीत असतात. खूप वाचनीय परीक्षण लिहीत असतात.

दैव या धनंजय पाटील यांच्या कथासंग्रहाचे परीक्षण करताना ते लिहतात,

सध्या ग्रामीण लेखन करणारे लेखक कमी होत आहे, अशी चर्चा वारंवार होत असते. ज्याप्रमाणे जंगलात वाघांची संख्या कमी झाली आहे तसेच ग्रामीण लेखन करणाऱ्या कथाकारांचीही संख्या कमी होत आहे असा सूर जेव्हा समाजातून येतो, तेव्हा ग्रामीण साहित्याच्या भविष्याची चिंता निश्चितच सर्वांना वाटते. परंतु या गोष्टीला छेद देत ग्रामीण तरुण कथाकार सध्या पुढे सरसावले आहेत. त्यातील एक महत्त्वपूर्ण नाव म्हणजे धनंजय शंकर पाटील…!

रेणू दांडेकर यांच्या मुंग्याच्या कथा याविषयी लिहताना ते या पुस्तकाचे उपयुक्त मूल्य सांगताना लिहतात,

सर्वात लहान कीटक म्हणजे मुंगी. त्यांचे जीवन कसे असेल ? याची लहान मुलांना नेहमीच उत्सुकता असते. ते त्याचे नेहमी निरीक्षण करतात. मग त्यांची जिज्ञासू वृत्ती जागृत होते. त्यांना ज्या गोष्टीचे अधिक कुतूहल वाटते. त्याविषयी ते मोठ्यांना अनेक प्रश्न विचारतात. या प्रश्नांची उत्तरे काहीजण देतात तर काहीजण देतही नाही. मुलांचे भावविश्व ओळखून त्यांना नेहमी कुतूहलाचा विषय ठरलेला मुंग्यांच्या जगात नेमकं काय चाललं असेल हीच गोष्ट हेरून लेखिकेने या पुस्तकाची निर्मिती केली आहे. यात मुलांना मनोरंजन करतील अशा गोष्टींची निर्मिती तर आहेच शिवाय त्यांच्या ज्ञानात भर पडेल अशी विज्ञान विषयक माहितीही लेखिकेने आवर्जून सांगितलेली आहे. त्यामुळे हे पुस्तक वाचताना ज्ञानाबरोबर मनोरंजनही होते, हे विशेष.

प्रत्येक पुस्तकाविषयी त्यांनी अभ्यासपूर्वक परीक्षण लिहले आहे. मराठी साहित्याच्या अभ्यासक यांनाही हे पुस्तक उपयुक्त आहे.

     मी दोनशे पुस्तके वाचून त्याचा परिचय लिहल्याबद्दल वाचनसाखळी समूह यांच्याकडून मला वाचनश्री पुरस्कार मिळाला आहे. माझ्या या कार्याची दखल सचिन बेंडभर यांनी घेऊन मला हे पुस्तक अर्पण केले आहे. मलाही माझे वाचन अधिक वाढवण्यासाठी त्यांनी एक प्रकारे प्रेरणा दिली आहे. त्यांचे मनापासून ऋण व्यक्त करतो.


- प्रा कुंडलिक शांताराम कदम.

 शिक्षक भवन,

तळेगांव ढमढेरे पुणे.

पाचे पाचे पंचावनचा खेळ आणि शब्दांचा ताळमेळ म्हणजेच - 'विचारांच्या पलीकडे'

 


बॅकेतील आकडेमोडीशी खेळता खेळता शब्दांचा सारीपाट मांडणाऱ्या अशोक बी. कांबळे या कवीच्या 'विचारांच्या पलीकडे' या काव्यसंग्रहाकडे पाहिले की, खरंच याची प्रचिती येते. खरं तर हा मित्र माझ्या सहवासाच्या पलीकडे जावून एक काळ लोटला होता. मी सन १९८६ ते १९९६ या कालावधीत एटापल्ली या आदिवासी तालूक्यात कार्यरत असतांना या मित्राशी ओळख व मैत्री झाली होती.ती आजतागायत कायम आहे. पण मध्यंतरीच्या काळात पोटापाण्यासाठी आपापले क्षेत्र निवडून आम्ही एकमेकांपासून वेगळे झालो, ते तब्बल ४० वर्षानंतर आमची भेट नियतीने नव्हे; थोबाडपुस्तकाने घालून दिली. थोबाडपुस्तक म्हणजे 'फेसबुक'. मला या थोबाडपुस्तकाचे काही फारसे समजत नाही. पण माझ्या दुसऱ्या एका मित्राने मला याची थोडीफार ओळख करुन दिली. आणि मी ते हाताळू लागलो. व त्यात हा जुना हरवलेला मित्र गवसला. मागील वर्षी फेसबुकवरुन माझ्या संपर्कात आला. आणि नागपूरच्या 'साहित्य विहार' संस्थेच्या मला मिळालेल्या पुरस्काराच्या निमीत्ताने त्याची माझी पुनश्च भेट झाली. व त्याच भेटीचं फलीत म्हणजे त्यांनी मला दिलेला व आज समीक्षणाच्या रुपाने येणारा 'विचारांच्या पलीकडे' हा कविता संग्रह.

'विचारांच्या पलीकडे एक गांव असतं, त्यालाही एक नाव असतं,

मनामध्येच त्याला ठाव असतं, 

त्याच नावाचं श्रध्दा व अंधश्रध्दा असतं'. 

या ओळी पाहिल्या की, कवी नवोदित आहे. हे लगेच लक्षात येतं. ट ला ट जुळवण्याचा हा कवीचा प्रयत्न फसलेला असल्याचं निदर्शनास येतं. कवीच्याच ओळीत-

'विचारांच्या पलीकडे एक गांव असतं, 

त्यालाही एक नाव असतं

मनामध्येच त्याला ठाव असतं, 

श्रध्दा व अंधश्रध्दा त्याचं नांव असतं'

असं सुटसुटीत लिहीता आलं असतं कदाचीत. 

    कवी नवोदित. आणि त्याचे प्रकाशक आणखीनच नवोदित.किंवा कवीच्या नवखेपणाचा फायदा घेवून त्याला गुंडाळण्याचा प्रयत्न केलेला दिसतोय. कवीला प्रेरणा देण्याच्या नावाखाली प्रकाशनाचा व्यवसाय हा एकच उद्देश डोळ्यासमोर असलेले. पण तेही निटसे जमलेले नाही. पुस्तकांचे पेजेस एकामेकात मिसळलेले. प्रस्तावना व मनोगत एकमेकांत गुंतलेले. जसे नवोदित जोडपे नको त्या ठिकाणी एकमेकांच्या मिठीत नको त्या अवस्थेत अवघडून असल्यासारखे. पहिल्या पानावर पुस्तकाची प्रस्तावना सुरु केल्यानंतर ते अर्धवट सोडून दुसरे पान मनोगताचे. आणखी तिसरे पान अर्धवट प्रस्तावनेचे. पुस्तकाची बांधणी तर अगदीच तकलादू.नाही म्हणायला पुस्तकाचे मुखपृष्ट आणि मलपृष्ठ सुरेख आहे तेही कवींच्या चिरंजीवांची कृपा म्हणून. त्याबद्दल चि. अमितचे कौतुक करावेच लागेल. यात प्रकाशकाची आणि मुद्रकाची भुमिका 'पुस्तक काढून टाकू', असे असलेलीच. कदाचीत आर्थिक बाजूही त्याला कारणीभूत असू शकते. असा हा कवितासंग्रह एकूण पंचावन कवितांनी समृध्द आहे.

कवीमित्र अशोक कांबळे यांनी लिहीलेल्या कवीतेतून नवोदिताची झलक दिसत असली तरी आदरणीय कवीवर्य ए. के. शेख सर यांची प्रस्तावना व प्रदिप अडकिणे यांची समीक्षा ही एक जमेची बाजू आहे. बुडत्याला काठीचा आधार देणारी. नाहीतर नमनालाच घडाभर तेल ओतावं अशा शुभेच्छांचा मारा व अभिप्रायांनी पुस्तकाची सुरुवातच कंटाळवाणी झालेली आहे. पुस्तकातील कवीच्या पहिल्या कवितेला पोहचेपर्यंत या शुभेच्छांनीच गुदमरायला होतं. खरा वाचक हा आपल्या वाचनाची सुरुवातच प्रस्तावने पासून करतो आणि कवितेपर्यंत पोहचून त्यात गुंतून जातो. असे चित्र असते. पण इथे चित्र वेगळेच.पहिल्या कवितेपर्यंत पोहचतांनाच पुस्तक बाजूला ठेवण्याची वेळ येते. नवोदित कवीला खुप वाटते की आपलं कोणी कौतुक करावं, त्यांच्या शुभेच्छा, आशिर्वादाचा हात आपल्या पाठीशी असावा. पण किती ?किती शुभेच्छा असाव्यात सुरुवातीलाच, याचा काही ताळमेळ? (या शुभेच्छा कविता संग्रहाच्या शेवटही देता आल्या असत्या, पाठीवर कौतुकाची थाप असल्यागत.) खरंच सारं विचारांच्या पलीकडेच आहे.

प्रस्तावनाकार शेख सरांनी त्यांच्या प्रस्तावनेत एक छान वाक्य लिहीलेले आहे- 'कविता लिहीण्याची प्रक्रिया जेंव्हा सुरु होते, तेंव्हा एखादी ओळ आपल्याला सुचते.ती ओळ म्हणजे त्या क्षणाचं देणं असतं' अगदी खरं आहे सरांचं. या क्षणाचं सोनं करण जमलं तर कवी पुढे नावारुपास येण्यास अधिक वाव असतं. त्याला इतर सहकाऱ्यांकडून मिळालेलं नेमकं मार्गदर्शन हे त्याचं पाठबळ असतं आणि तिच त्याच्या पुढील काव्यप्रवासाची सुखद सुरुवात असते. पण कवींनी या परिस्थितीत हुरळून न जाता आपली वाट कशी सुकर होईल, याचा अभ्यास व सराव करणे, हेही महत्वाचं आहेच.

कवी अशोक हे प्रतिभावंत कवी आहेत, हे त्यांच्या कव‍िता वाचल्यानंतर लक्षात येते.पण त्यांची प्रतिभा आणि प्रतिमा सजविण्यासाठी जे स्पंदन आवश्यक होते, ते त्यांना वेळीच मिळविता आले नाही. त्यामुळे त्यांच्या कविता नवोदिताच्या चक्रव्युहातच फसून राहिलेल्या आहेत. पुढील काव्यप्रवासाच्या दृष्टीने त्या आवर्तनातून त्यांनी बाहेर पडणे अत्यंत आवश्यक आहे.इतरही अनेक कवी व कवितांचा त्यांनी आकलन आणि आस्वाद घेणे आवश्यक आहे. तथापी त्यांच्या काही कवितांचं  कौतुक करणेही  आवश्यकच  आहे.

कवी अशोक यांचे पत्नीवरील प्रेम कौतुकास्पद आहे. 'आधार मायेचा' या कवितेतील पहिल्याच कडव्यात कवी पत्नीप्रेमाने भारुन सहजपणे म्हणतात- 'साथ आहे तुझी, दुधातली साय, ममतेची माय, पत्नी माझी'. एवढं प्रेमाचं सोज्वळ रुप क्वचीतच पाहायला मिळतं. पण 'नवरा म्हणजे खुट्याचा बैल असतो' (कविता-नवरा म्हणजे) असे ही प्रेमळ पत्नी आपल्या नवऱ्याविषयी बोलू शकेल का, याला उतर 'अगदीच नाही' असेच असेल. पण कविता लिहीण्याच्या नादात आणि संग्रहातील क्रम ठरवितांना मात्र गफलत झालेली असल्याने हे चाणाक्ष वाचकांच्या चटकन लक्षात आल्यावाचून राहत नाही. पण या बैलोबाची पुन्हा पत्नीप्रेमाने गुगली झाल्याचे दिसून येते. तो पुढील कवितेत पुन्हा -

'गुलाबी थंडीत घ्यावे, 

शाल गरम कश्मीरी,

येईना सर गं त्याला, 

कवेची ऊब गं भारी' म्हणत तिच्या कवेत ऊब घेवून मदमस्त होतांना दिसतो. तो 'गारवा' कवितेतून प्रेयसीचा पुन्हा ऊबदार स्पर्श अनुभवतो तर 'गंधाळलेल्या वाटेवर' आपल्या देवकीसह (सौ. वहिणी बरं का) प्रेमाची गाणी गातो. संसार वेलीवर उमललेल्या दोन फुलांना जपण्याचे आश्वासनही देतो. प्रितीच्या पाखरांना निमंत्रण धाडण्याची गरज नाही, तर प्रितीगंधाचा सुवास हेच त्यांचे आमंत्रण असल्याची प्रतिमा साकारतांना कवी भावविभोर झालेला दिसतो. 'माझ्या आकडेवारीच्या जगात तु काय पाहिलंस माझ्यात' असा प्रेमळ प्रश्नही तो आपल्या पत्नीला विचारतो तर तिच्या ओठांच्या स्पर्शात साऱ्या जगाच्या आनंदाची अनुभुतीही अनुभवतो. फेसाळलेल्या सागराच्या उंच लाटांनी मनात उठलेल्या वादळांना शमविण्यासाठी पुन्हा तिच्या कवेचाच आधार घेतो.(कविता- सागरी किनारा) तर सासरची आणि माहेरची अशा दोन्ही घरातील तूच 'स्वयंसिध्दा' असल्याची कबूलीही देवून तिचे ऋण फेडण्याचे प्रयत्नही करतो. स्वप्नांच्या चंदेरी दुनियेत अनुभवलेले क्षण कितीही गोड असले तरी एकदा जाग आली की बाकी काही उरत नाही, हे सांगायलाही कवी विसरत नाही.(कविता- बाकी काही नाही).इति प्रेमपुराणम् संपुर्णम्. बापरे ..! मोजून झडनभर प्रेमकवितांचा हा खजिना तर! खरंच भाग्यवान आहे त्याची प्रेयसी म्हणा किंवा अर्धांगिनी म्हणा किंवा बायको म्हणा किंवा आमच्या वहिनी म्हणा. अरे हो एक सांगायचचं राहिलं. आमच्या 'जोडीदार' या प्रातिनिधीक कवितासंग्रहादेखील त्यांची एक पस्तीसाव्या लग्नाच्या वाढदिवसाची कविता आहे बरं का, 'पस्तीस वसंताचं नातं- देविकासाठी'.

आता कोणी म्हणेल कवीला प्रेमकविता लिहायला आणि समीक्षकाला या प्रेमकवितांची मजा लुटायला बरी सवड मिळाली.तर तसे नाही. प्रेमकविता लिहीतांना हा कवी मायेची ममता देखील तेवढयाच ममतेने चित्तारतोय. हे सांगायला मी विसरणार नाही.मग ती माता शिवयारांची असो की त्यांची स्वत:ची. ममतेचे ऋण फेडण्याचा प्रयत्न कवी या कवितेतून करतो. म्हणून 'मातोश्री' या कवितेतून 'माता व्हावी ऐसी, शिवाजी घडावा जैसी' असे सांगतांनाच 'ऐशा माता व्हाव्या, संस्कार ऐसे व्हावे, माणूसकीची मशाल, प्रत्येक ह्रदयी जागावे'. असेही कवी सांगतो. आई कवितेत- 'किती करते ममता, सारी भावंडे समान, मुला मुलींचे नसते,  तिच्या जवळ मापन'. आई मुलामुलीत कुठलाही भेद करीत नाही तर सर्वांना प्रेमाने- मायेने जवळ घेते. कवेत घेते. सर्वांवर सारखेच प्रेम करते. त्यांच्या चोचीत चारा भरवतांना आपलं प्रेमही भरभरुन भरवित असते. तेंव्हाच मुलांना 'आईच्या कुशीत' शिरुन प्रेमाची ऊब घेता येते. जगण्याचे धडे मिळतात, आत्मविश्वासाचं बळं मिळते. भगीरथानं गंगेला धरित्रीवर आणलं आणि या अशोकानं आपल्या 'भगिरथाबाई' आईला कवितेत आणलं ते तिची महती सर्वांना पटवून देण्यासाठीच, याची प्रचिती येते. तसेच आपल्या लग्न झालेल्या मुलीला प्रेमानं 'जा मुली जा, दिल्या घरी तू सुखी रहा' असे मुसमुसत सांगतांना कवी भावविभोर झाल्याचेही दिसून येतो.

मातेसोबतच मातीची महती गायलाही कवी विसरत नाही. माता आणि माती मानवी जिवनातील अविभाज्य अंग आहेत. माता जन्म देते तर माती जगण्याचं बळ देते. या मातीची गाथा, मातीची महती गातांना कवी म्हणतो- 'धरणी शोषून घेते पाणी, 

माळ रानावर होई शेती, 

दगडालाही पाझर फुटतो, 

उन्नत शेती सुपीक माती'. 

ही माती जेंव्हा गर्भार होते तेंव्हा धरतीमातेच्या उरावरील समस्त प्राणीमात्रांना नवजीवन मिळते. 'घामाच्या थेंब थेंब धारेचे सिंचन,  

गर्भार झाली माती आली वर, 

रोपे आली वर टाळी वाजवित'. 

हीच टाळी समस्त प्राणीमात्रांच्या जगण्याची आशा पल्लवित करते. आणि पुढे ती भोजनाच्या थाळीत अन्नाच्या रुपाने समोर येते. निसर्गवर्णन आणि ऋतूमानाच्या कविताही कवींनी लिहील्या असून या कवितांमध्येही कवीने चांगलीच रंगत भरली आहे.

श्रध्दा आणि अंधश्रध्दा यावर भाष्य करायलाही कवी विसलेले नाहीत. त्यांच्या मते श्रध्दा ही अंधश्रध्देची जननी आहे. बरोबर आहे. देवावर विश्वास ठेवणे ही श्रध्दा, तर देवाच्या नावावर बुवाबाबांवर श्रध्दा ठेवून आंधळेपणाने आणि अविचाराने वागणे, ही अंधश्रध्दा. भोळ्या जनतेच्या बुवा बाबा, तांत्रिक मांत्रिक यांच्यावरील अंधश्रध्देपोटी त्यांची दुकानदारी चालते, हे अगदी बरोबर आहे. जे जे वास्तव आहे,त्यावर विश्वास ठेवणे ही खरी श्रध्दा आहे. अंधश्रध्दा निर्मुलनाचे कार्य करणाऱ्या महामानवांचे कार्य हे विचारांच्या पलीकडचे आहे, आणि ते आपणही आत्मसात करायला हवे, असे सांगतांनाच शाम मानव,नरेंद्र दाभोळकर इ.विचारवंतांना प्रणाम करायला कवी विसरत नाहीत. मिसाईल मॅन कवितेत ते भारताचे राष्ट्रपती अब्दूल कलाम यांना श्रध्दांजली वाहायलाही विसरत नाहीत.

सिमेवरील जवानांचे या देशाप्रती योगदान व त्यांची देशसेवेप्रती असलेली श्रध्दा यावर कवी नतमस्तक होतो. 'मातृभूमी' या कवितेत -

'होऊ दे आघात किती,नाही कुणाचीच भिती,

 मातृभूमी रक्षण्याशी आमची निधडी छाती' 

असे छातीठोकपणे सांगतांना कवीचे ऊर अभिमानाने भरुन येते. आणि शहिदांना श्रध्दांजली अर्पण करण्यासाठी- 

'खरी श्रध्दांजली द्यायची असेल,

सिमेवर पेटवा रान सुडाचे, 

घडधडू द्या आता तोफा बंदूका, 

भस्म होई मनसुबे दुष्मनांचे' असे ठणकावून सांगतो. सच्चे दान कोणते यावर कवी 'दानधर्म' कवितेतून सांगतात ‘देशासाठी दान सैनिक करती, 

सिमेवर देती बलिदान'. सैनिकांच्या या देहदानावर आमचा मान, अभिमान सर्वकाही आहे. बाकी सारे दान मिथ्या आहेत.

भारतीय संविधानाने भारतीयांना दिलेले अधिकार, प्रजासत्ताक दिनाचे महत्व, रमाबाई आंबेडकरांचे कार्य, त्यांनी भोगलेल्या व्यथा आणि याची परतफेड म्हणून बाबासाहेबांनी त्यांना अर्पिलेले थाट्स आन् पाकिस्तान ग्रंथ याची नोंद कवी जाणीवपुर्वक करुन त्यांच्याप्रती आपले ऋण फेडण्याचे प्रयत्न करतात. प्रज्ञासुर्याला मानवंदना करतात. रमाबाईपुढे नतमस्तक होतात. भारतीय संविधानाचा अभिमान बाळगतात. अनैतिक संबंध कायदा ४९७ वर कविता लिहीणारा माझ्या माहितीप्रमाणे हा पहिलाच वैदर्भीय कवी आहे.

निवडणूकीच्या निमीत्ताने पांढरे डगले घालून हातपाय जोडणाऱ्या आणि नंतर मतदारांकडे ढुंकूनही न पाहणाऱ्या बगलाभगतांचे वर्णनही कवी मोठ्या खुबीने करतात. व संग्रहाच्या शेवटी त्यांना प्रश्नही विचारतात- 

'माझ्या अंगणात तुहं काय काम रं, 

तु आस्वासन देणारा, तुहं खरं नाय रं'. 

आणि म्हणूनच माझ्या या चार ओळी अशोकासाठी-

अशोका दोस्ता, तुझ्याच मते, 

गर्भात गुदमरु देऊ नकोस कवितेला, प्रसव वेदनेचा आनंद उपभोगू दे 

नवकवी नावाच्या काव्यमातेला

प्रसवू दे शब्दांना जरी असतील ते

अपंग अबोल अधुरे अनामिक

सुदृढ असेल तर फारच छान

नसेलच तर पाजायला बाळकडू आण

मात्र, जन्माआधी होवू नये गर्भपात कवितेचा

किंवा गर्भातच मरु नये ही गोंडस प्रतिमा.

कवितेला आकार येवू दे, जन्म घेवू दे

मगच ठरवू ती कुपोषित आहे की सुदृढ

आणि करु या तिचे पालनपोषण, औषधोपचार.

देवून आपण परिक्षणाचे डोज आणि समीक्षणाचे संस्कार.

घेवू या आपण काळजी संवर्धनाची,

तिच्या, त्याच्या आणि आपल्याही जाणिवांना

बळकट करण्याची.

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- चुडाराम बल्हारपुरे .

भ्रमणध्वनी-९६२३६६३४३५

"विचारांच्या पलीकडे" (कवितासंग्रह), कवि – अशोक बी. कांबळे

प्रकाशक- शिवानी पब्लिकेशन, मुंबई, किंमत- रु. १००/- फक्त.

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इन अंखियन में नीर न देना....- कलाम अहमद खान

 

पीर हृदय की हरने वाले

इन अंखियन में नीर न देना....


जब से ये सहवास मिला है

एक नया मधुमास मिला है

विरह तपन में तपने वाले

इन अधरों को हास मिला है


पंछी बन उडूं गगन में

खुशियां हो जीवन-मधुबन में

कोई निराशा रहे न मन में

खिले सपनों के फूल आंगन में


हाथ मेरा अब थामनेवाले

जुल्मोसितम की जंजीर न देना

पीर हृदय की हरने वाले

इन अंखियन में नीर न देना....


भालचंद्र मेरे तुम हो

तुम दीया हो मैं हूं बाती

तनमन सब सेवा में अर्पण

सुन लो मेरे जीवन साथी


खुशहाली हो गोकुल जैसी

अपना घर वृंदावन लागे

पाकर तुम्हे ये माना मैंने

सच में मेरे भाग ही जागे


प्रेम तुम्हारा पूर्ण मिले बस

दूर नफरत से कर न देना

पीर हृदय की हरने वाले

इन अंखियन में नीर न देना....


(पीर-पीड़ा,नीर-आंसू,अधर-होंठ )


- कलाम अहमद खान

भिवापुर, जि. नागपुर

संवाद : ९६५७३४७६८८


मी पाहिलेला असा एक अवलिया– जगन्नाथ शेळके गुरुजी




विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म भेदाभेद भ्रम अमंगळ..!

शब्दशिल्प/पुणे

धनगरवाडी गावाचे लाडके आदर्श शिक्षक जगन्नाथ शेळके गुरुजी(अण्णा) यांचा अभिष्टचिंतन सोहळा दिनांक ०५ सप्टेंबर २०२५ रोजी धनगरवाडी येथे श्री श्री गणेशोत्सव उत्सव प्रसंगी आणि शिक्षक दिनाचा दुग्ध शर्करा योग मिळून येऊन स्नेही सहृदयांच्या स्नेहल उपस्थितीत सपत्नीक साजरा करण्यात आला.

एखाद्या व्यक्तीने गावासाठी किती योगदान द्यावे आणि त्याबद्दल त्यांचा पूर्ण सन्मान वा जाणीव ठेवून गावाने त्यांच्यावर किती जीव लावावा हे या सोहळ्यातून अनुभवत असताना भावनिक वातावरण तयार झाले.

स्वतःच्या अजातशत्रू वागण्याने जनसामान्यांकडून अभूतपूर्व असे प्रेम मिळणारे आणि त्याचा कधीही गर्व झाला नाही किंवा आकर्षणही वाटू न देणारी...थोडक्यात अहंकारावर पूर्ण विजय मिळवलेली व्यक्ती म्हणजे श्री जगन्नाथ दादाभाऊ शेळके गुरुजी. कधीही, कसलाही मोठेपणा नाही, बडेजाव नाही सर्व गावचे गावकरी, सगे सोयरे व मित्रपरिवार यांच्या समृद्धीची मागणी आपल्या अमोघ वाणीतून गावातील विविध धार्मिक उत्सव, पोथी-पारायण, विविध सण-समारंभ यावेळी करताना सर्वांनी जी व्यक्ती गेली अनेक वर्ष अनुभवली त्या गुरुजींबद्दल ऋणानुभाव मनात बाळगून गुरुजी नको म्हणत असताना गावातील सर्व तरुण-ज्येष्ठ ग्रामस्थांनी एकत्र येऊन त्यांचा ७५ वा अभिष्टचिंतन सोहळा थाटामाटात एखाद्या उत्सवाच्या स्वरूपात साजरा केला.

जेष्ठ बंधु आदर्श शिक्षक कै. सुखदेव शेळके गुरुजी यांचेनंतर इंग्रजी विषयाचे गाढे अभ्यासक कै सुरेश(अप्पा) शेळके सर आणि प्रेमळ असे आबा अर्थात ज्ञानेश्वर शेळके सर या तीनही भावंडांची गावाला आणि कुटुंबाला भासत असलेली उणीव  भरून काढत आयुष्याचे शतक पार करण्याची ऊर्जा श्री बाप्पा विघ्नहर्ताने आपणास या प्रसंगी दिली हे निश्चित.     

ग्रामस्थांनी आयोजित केलेल्या औपचारिक कृतज्ञता सोहळ्याच्या निमित्ताने राजकीय, शैक्षणिक, सामाजिक तसेच वारकरी संप्रदायातील विविध मान्यवर उपस्थित होते*.


गावातील तसेच आमंत्रित पाहुण्यांनी, गावातील तरुण-तरुणी यांनी व्यक्त केलेली *भावनिक मनोगते या कार्यक्रमाला एका वेगळ्या उंचीवर* घेऊन गेली.


देवऋण, ऋषिरूण, मातृ-पितृऋण, आणि समाजऋण हे *ऋण फेडण्यापेक्षा ते जाणणे, मानणे आणि त्या ऋणात राहणे अधिक श्रेयस्कर*...कारण त्यामुळे ऋणानुबंध पिढ्यानपिढ्या दृढ होतात अशी आपली संस्कृती सांगते.... हे *जाणणाऱ्या आणि हे जाणून गुरुजींचा(अण्णांचा) ऋणनिर्देश सोहळा संपन्न करणाऱ्या सर्व युवा सहकाऱ्यांचे खास कौतुक करावे तेवढे थोडे!!*


ऋणनिर्देश सोहळ्यात गुरुजींबद्दल सर्वजण भरभरून बोललातच... अधिक काय लिहिणे...


ज्यांनी ज्यांनी आपापल्या परीने कार्यक्रम यशस्वी होण्यासाठी हातभार लावला... *व्यवस्थापनाची जबाबदारी समर्थपणे पेलली अशा सर्व दृश्य-अदृश्य साथ देणाऱ्या हातांना धन्यवाद

- गणेश शेळके / राजेंद्रकुमार शेळके .धनगरवाडी, पुणे. 


मंगळवार, ९ सप्टेंबर, २०२५

तालुकास्तरीय फुटबॉल क्रीडा स्पर्धेमध्ये अल्फोंसा सीनियर सेकंडरी स्कूल (सावंगी मेघे) प्रथम



 शब्दशिल्प/वर्धा-क्रीडा व युवक सेवा संचालनालय महाराष्ट्र राज्य पुणे तसेच जिल्हा क्रीडा परिषद वर्धा कार्यालय यांच्या वतीने जिल्हास्तरीय शालेय क्रीडा स्पर्धेचे आयोजन करण्यात आलेले आहे वर्धा तालुकास्तरीय फुटबॉल क्रीडा स्पर्धेमध्ये 17 वर्षीय वयोगटांमध्ये अल्फोंसा सीनियर सेकंडरी स्कूल (सावंगी मेघे) यांनी प्रथम येऊन जिल्ह्यात प्रतिनिधित्व करण्याचा मान मिळवला आहे  सहभागी खेळाडूमध्ये  अथांग ताकसांडे (गोल किपर ) शंतनु अवथरे ( कॅप्टन )  सक्षम पाटील, दक्ष पाटील, हिमांशु सिंग, हिमांशु धोटे, ओम कोहळे, अफनान खान, ऋतुराज वैरागडे, तन्मय गायकवाड, उमंग जीवतोडे, निर्भय कांबळे, प्रतिक कांबळे, , चिन्मय गिरडकर, ध्रुव चौधरी, श्रेयस मानकर, सुशांत वडतकर, आदींनी स्पर्धेत विशेष ठसा उमटवला शाळेचे क्रिडा शिक्षक श्री संदीप खेर सर यांच्या नेतृत्वाखाली संघाने विजय मिळवला शाळेच्या प्राचार्य सिस्टर नव्या तसेच सर्व शिक्षक व शिक्षकेत्तर  कर्मचारी यांच्या कडून संघाचे अभिनंदन करण्यात आले व पुढील वाटचाली साठी शुभेच्छा दिल्या. हार्दिक अभिनंदन

आनंदी जीवन जगण्याकरिता मेंदूशी मैत्री करणे अत्यंत आवश्यक - डॉक्टर श्रुती पानसे



शब्दशिल्प/पुणे-दलित स्वयंसेवक संघ व अण्णा भाऊ साठे स्मारक संस्था यांचे संयुक्त विद्यमाने व्याख्यानमालेचे 422 वे पुष्प साहित्यरत्न अण्णा भाऊ साठे ग्रंथालय के ब्लॉक नेहरू स्टेडियम पुणे सारसबागे समोर या ठिकाणी आयोजित करण्यात आले होते. मेंदूशी मैत्री या विषयावर डॉक्टर श्रुती पानसे यांनी फार सुंदर वैचारिक मांडणी केली.

त्या म्हणाल्या "मेंदूशी मैत्री करण्यासाठी ताण टाळला पाहिजे. ताणामुळे विविध आजार होतात. ताण हलका करण्यासाठीही शरीराच्या हालचाली आवश्यक ठरतात. जास्त काळासाठी मोबाईल फोनचा वापर करणे, घातक आहे. शालेय वयातल्या, अभ्यास करणाऱ्या मुलांसाठी तर अतिशय वाईट आहे."

कार्यक्रमाची सुरुवात शाहीर सदाशिव भिसे यांच्या प्रबोधन गीतांनी झाली. प्रस्ताविक शौर्य अकॅडमीचे हरिदास भिसे यांनी केले. अध्यक्षस्थान दलित  स्वयंसेवक संघाचे माजी संघप्रमुख दादासाहेब सोनवणे हे होते. समारोपा चे  भाषण करताना ते म्हणाले "डॉक्टर श्रुती  पानसे यांनी मेंदू या विषयावर  पी.एच.डी. केलेली आहे. लहान मुलांपासून वयोवृद्ध माणसांपर्यंत जास्त वेळ एकाच ठिकाणी न बसता सातत्याने हालचाल करणे आवश्यक आहे. त्यातूनच मेंदूशी मैत्री जोडली जाते."

आभार युक्रांचे संदीप बर्वे यांनी मानले. सदर कार्यक्रमास जेजुरीचे दिलीप दोडके,चाकणचे रामराव कांबळे,राजगुरुनगर चे नवनाथ लोंढे.प्रतिभावंत लेखिका सुभा आत्माराम लोंढे, लेखक बाळासाहेब भारस्कर,बर्वे ताई,इब्राहिम खान,लाल सलाम वाले काका, श्री व सौ दीपक घोलप, ज्ञानेश्वर पाटोळे आणि कवी विनोद अष्टुळ उपस्थित होते.

चर्मकार समाजातर्फे इंजि. चंद्रप्रकाश देगलूरकर यांचा ओबीसी मित्र पुरस्काराबद्दल सत्कार




शब्दशिल्प/नांदेड- भारतीय पिछडा शोषित संगठन व ओबीसी समन्वय समिती जिल्हा शाखा नांदेडच्या वतीने अ. भा. गुरु रविदास समता परिषदेचे नेते इंजि. चंद्रप्रकाश गंगाधरराव देगलूरकर यांना ओबीसी मित्र पुरस्कार रविवार दि. ७ सप्टेंबर २०२५ रोजी विसावा हाॅटेल नांदेड येथे प्रदान करण्यात आला. याबद्दल चर्मकार समाजाच्या वतीने शासकीय विश्रामगृह नांदेड येथे त्यांचा भव्य सत्कार करण्यात आला.

        सेवानिवृत्त पोलीस उपायुक्त (छ. संभाजीनगर) व चर्मकार समाज भूषण बालाजीराव सोनटक्के यांच्या प्रमुख उपस्थितीत संपन्न झालेल्या या व्यापक बैठकीत हा भव्य सत्कार करण्यात आला. या बैठकीच्या अध्यक्षस्थानी विस्तार अधिकारी विठ्ठलराव कांबळे हे होते.

       ज्येष्ठ सामाजिक कार्यकर्ते व्यंकटराव दुधंबे यांनी या बैठकीचे संयोजन केले होते. सेवानिवृत्त पोलीस निरीक्षक व्यंकटराव उतकर, अशोक लाठकर, सामाजिक कार्यकर्ते अशोक गोरे, जमनाजी डोंगरे,  शिवानंद जोगदंड, नरसिंग सुर्यवंशी, शिवाजी सोनटक्के, नागनाथ सुर्यतळे, श्रीराम गोरे, गंगाधर सोनटक्के, आस्तिक कोरडे आदींची यावेळी प्रमुख उपस्थिती होती. 

खरा तो एकची धर्म, जगाला प्रेम अर्पावे....सौ. मनीषा विशाल सोन्नेकर

      मनुष्य हा देखील एक प्राणीच. मात्र, इतर प्राण्यांपेक्षा अतिशय हुशार व तर्कबुद्धी असलेला आणि चांगल्या विचारविनिमयाची कास धरणारा प्राणी. ...