कोई आए या जाए कोई
कालचक्र थमता नहीं है....
दिन-रात का वही फसाना
धूप-छांव की वही कहानी
कहीं पे सूखा,कहीं बाढ़ है
मर्जी की पानी की रवानी
जिसने अमावस का तम देखा
पूनम की रश्मि में नहाया
मिलन का जिसने मधुमास देखा
विरह के आसू रोक न पाया
सुख-दुख तो हैं आने जाने
एक जगह कोई रमता नहीं है
कोई आए या जाए कोई
कालचक्र थमता नहीं है....
नवागतों का स्वागत करने
शाखा त्यागे पीले पात
दादा की अर्थी उठे तो
झूले में पोता नवजात
कहीं कबर पे होती फातिहा
कहीं गंगा में राख बहे
आखिर कह गए अलविदा
जो भी अपने साथ रहे
तन की धर्मशाला में आत्मा
सदा के लिए ठहरता नहीे है
कोई आए या जाए कोई
कालचक्र थमता नहीं है....
- कलाम अहमद खान,नागपुर
संवाद : ९६५७३४७६८८
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