एक सुलझाओ दूजी तैयार
है सर पर नाच रही उलझन....
एक जान और लाख झमेले
निपटे कैसे इनसे अकेले
हो गए अस्थिपंजर ढीले
भगवन आकर इनको कसले
चारों तरफ टेंशन ही टेंशन
फिर कोई कैसे रहे अटेंशन
बिना पैसों के काम न होते
कितना बढ़ गया करप्शन
मानव मन का विवेक मरा तो
करते दानव जैसा आचरण
एक सुलझाओ दूजी तैयार
है सर पर नाच रही उलझन....
एक पद और हजार आवेदन
बेकारों से भरा शहर है
मुश्किल है दो समय का भोजन
उस पर महंगाई का कहर है
खानेवाले जीव अनेकों
कमानेवाली एक ही जान
तंगी में ही गुजारा होता
कैसे होगा फिर समाधान
घर घर में बजते ही रहेंगे
जब टकराए आपस में बरतन
एक सुलझाओ दूजी तैयार
है सर पर नाच रही उलझन....
-कलाम अहमद खान
भिवापुर, जि. नागपुर
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