लक्ष्मी जब रूठ जाती है
संगी-साथी छूट जाते हैं...
जेब में जब तक पैसा होगा
यार भी यारी निभाएंगे
मेहफिलों का दौर चलेंगा
सब रिश्तेदारी निभाएंंगे
तरह तरह की कस्में होंगी
तहर तरह के वादे होंगे
कोई कर्ज या उधार मांगेगा
पास तेरे जब रुपए होंगे
ऐसे वैसे लोग मतलबी
बहाने से लूट जाते हैंं
लक्ष्मी जब रूठ जाती है
संगी-साथी छूट जाते हैं...
जब गर्दिश में होंगे तारे
द्वार तेरा भूलेंगे सारे
सूनी मेहफिल-खाली जाम
आएंगा न फिर कोई काम
पछताने से क्या हासिल
चिडिय़ां जब चुग जाए खेत
फिर से अपने कदम जमा
समझ जमाने के संकेत
सच तभी सामने आता
जब झूठ के पर्दे उठ जाते हैं
लक्ष्मी जब रूठ जाती है
संगी-साथी छूट जाते हैं...
- कलाम अहमद खान,नागपुर
संवाद : ९६५७३४७६८८
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