उनके हाथों को आदत है
दुसरों के भरे हुए जख्मों को कुरेदने की
और हमारे लक्ष्य की ओर बढ़नेवाले कदमों को
शाप है
बीच सफर में कलम कर दिए जाने का...!
झुग्गियों की तकदीर में है
कारखाने की चिमनी से निकलने वाला
जहरीला धुआं...और अंधियारा
मजदूरों का खून चूस कर मदहोश है
रोशनाई में जगमगानेवाले एअरकंडिश्नर बंगले...
मजदूर हो या किसान
कितना भी बहाए पसीना
मेहनत का सही दाम नहीं मिलता
मौसम ऐसे बैरी हो गए हैं
खेतों में पहले जैसा अनाज नहीं उगता
रेहन रखी मुट्ठियां या अंगूठे
कुछ दे कर छुड़वा नहीं सकते
दूसरों के लिए
आलिशान बंगले बनानेवाले मजदूर
खुद का झोंपड़ा भी खड़ा नहीं कर सकते...
खूब छले गए,
मुफलिसी और शोषकों के दो पाटों में
पीसे गए,
फिर भी जी रहे है तंगहाली में
नाकाबंदी भेद कर
पूंजीपतियों से जंग लड़ कर
कैसे रोटी दे बच्चों की थाली में...?
-कलाम अहमद खान
२५ डी. आदर्श नगर,नागपुर
संवाद : ९६५७३४७६८८
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