झूमे कैसे खुशियों से
जब मनमयूरा घायल हो...
कांटें न बोए उनके पथ में
किसी का न दिल दुखाया
दीं लोगों ने पीड़ा ऐसी
उपाय न जिसका कर पाया
विवेकहीनता ये कैसी है
जज्बातों से हर कोई खेला
औरों का भला करने ही
मैंने हर संकट को झेला
भले मानस का जीना मुश्किल
रीत जहां की स्वार्थ-छल हो
झूमे कैसे खुशियों से
जब मनमयूरा घायल हो...
अपना अपना सब कहते है
जब करने की बारी आई
इसने उसने मुंह छिपाया
काम न कोई यारी आई
पीड़ा जिसने भेंट स्वरूप दीं
मैंने भी आभार है माना
असली चेहरा सामने आया
तब दुनिया को पहचाना
किंतु फिर भी सहना है
हृदयवेदना अगर प्रबल हो
झूमे कैसे खुशियों से
जब मनमयूरा घायल हो...
- कलाम अहमद खान,नागपुर
संवाद : ९६५७३४७६८८
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