भगवान मैंने कनक न मांगा
तांबा, कांसा चल जाएगा...
जितनी मेरी औकात है जानी
दिया तुमने उससे ज्यादा
किंतु महंगाई भी बढ़ी है
आय सीमित है, मिले न ज्यादा
श्रद्धा मेरी अपार है किंतु
महंगे हो गए पूजा-दर्शन
इएलिए धन और भी देना
शेष फिर तुझे ही अर्पण
इतना दे दे इस निर्धन को
कामकाज न टल पाएगा
भगवान मैंने कनक न मांगा
तांबा, कांसा चल जाएगा...
स्वर्ग की तेरे परी न चाहूं
पर संगिनी खरी ही देना
पतझर से मुझे क्या लेना है
देना जो हरीभरी ही देना
मैं न मांगू ज्यादा तुझसे
और करूं एक वादा तुझसे
जो दिया स्वीकार करूंगा
शिकवा मैं न करूंगा तुझसे
किंतु वधू ऐसी ही देना
देखनेवाला जल जाएगा
भगवान मैंने कनक न मांगा
तांबा, कांसा चल जाएगा...
-कलाम अहमद खान
भिवापुर, जि. नागपुर
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