(श्रीमति मनोरमा जैन अजमेरा बूंदी का जीवन परिचय)
आर्यिका १०५ वासपूज्य मति माता नाम मिला
गुरु माँ गणनी आर्यिका स्वस्ति भूषण
शब्दशिल्प/बाड़ा पदमपुरा(जयपुर)-एक होता है शास्त्र को पढ़ना और एक होता है शास्त्र को जीना और सारे शास्त्रो का सार है जीव अलग है पुद्गल अलग है, और धर्म का सार है इसकी साधना करना। जीव अन्य है पुद्गल अन्य है, यह बात चाहे श्लोक के द्वारा कही जाये या गाथा, ६५ कविता या गद्य रूप में सार तो यहीं है। चारों अनुयोग भी यही शिक्षा दे रहे है कि संसार से मोह हटाकर आत्मा की ओर ध्यान दिया जाये। आत्म साधना अध्यात्मिक जीवन इसी को कहा जाता है।
सारे शास्त्रों का सार है आत्मा को जानकर, कषाय से पापो से राग द्वेष, मोह से अपनी आत्मा को बचाया जाये। मन आत्म भावना में लगे और इन्द्रिया संयम में रहे। आते हुये कर्मों को रोकना। जाते हुये कर्मों का बड़े से बड़ा दरवाजा खोलना । यही प्रक्रिया, उत्तम साधना मोक्ष का रास्ता है।
बूंदी निवासी श्रीमति मनोरमा देवी उन्ही धर्मात्मा की श्रेणी में आती है, जो घर में रहकर, भक्ति और आत्मसाधना मे हर क्षण व्यतीत करती थी। तीनो अष्टान्हिका, तीनो सोलहकारण दशलक्षण जहाजपुर आकर रहती थी। प्रातः ४ बजे उठकर जिनकी सामायिक पाठ आदि की किया प्रारंभ हो जाती थी। सर्दी हो गर्मी बारिश वे किसी से भी प्रभावित नही होती थी। कमरे में अकेली रहे या किसी के साथ, कोई चर्चा नहीं, कोई बातचीत नहीं, किसी से कुछ कहना नहीं, कोई शिकायत नहीं करना। कभी कोई चीज नहीं मांगी । उनके पास सामान केवल दो थैले मे होता था, एक उनके कपड़े, जो कि धोकर शुद्ध करके अलग पेकिट मे रखती थी कि, एक दूसरे से टच न हो। दूसरे में पूजा की किताबे और ढेर सारी सामग्री। बस इतना ही उनका परिग्रह देखा था।
जब जहाजपुर मे रहती थी तब सुबह से ११ बजे तक पाठ पूजा करना, उसके बाद आहार देना। पश्चात सभी कहते थे पहले भोजन करलो, तब ये कहती कि मेरी जाप बाकी रह गई है मैं बाद में खालूँगी। खाने में कोई नखरे नहीं, कोई इच्छा नहीं, जो मिले शांति से खालेती। जाप पूरी करने ही खाती थी। दोपहर में जाकर देखो फिर हाथ मे या तो किताब या फिर माला मिलती थी। कभी किसी से बात करते नहीं देखा जब में २०१३ में बूंदी गई थी । ठीक
११ बजे मंदिर आती थी. ३-४ बजे तक अकेले मंदिर में बैठकर पूजा पाठ जाप करती शाम को जाकर भोजन करती थी। मैंने पूछा ऐसा क्यो, बोले घर के काम टाइम लग जाता है। इन्हें भूखा रहना स्वीकार था, पर इनका धर्म ध्यान छूट जाये ये स्वीकार नहीं था। गृहस्थी मे रहकर ऐसा कोई करे तो शायद घर वाले परेशान हो जाते है। पर ये कभी शिकायत नहीं करती थी। दिनांक ५ फरवरी २०२६ को पता चला कि इसकी आहार नली में ट्?युमर है डॉक्टर ने ऑपरेशन में लिए बोल दिया था। श्रीमति मनोरमा जी ने कहा मैं मुंह में नली नही डलवाऊँगी, और आहार पानी छोड़ दिया। ४ उपवास करके ये मेरे पास पदमपुरा आई। मैंने कह दिया अब में वापस नहीं जाऊँगी, मुझे समाधि दे दो। आजीवन अन्न जल का त्याग इन्होने आत्मशक्ति के साथ त्याग किया। राष्ट्रीय माडिया प्रभारी पारस जैन 'पार्श्वमणि' पत्रकार ने जानकारी देते हुवे बताया कि परम पूज्य चारित्र चक्रवाती आचार्य शांतिसागर जी महाराज की परम्परा के पंचम पट्टाचार्य परम पूज्य आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज एवं पूज्य गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी तथा गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी के पावन सत्संग-सानिध्य में धर्मनिष्ठा एवं श्रद्धामयी बहन मनोरमा देवी अजमेरा बूंदी की क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण करवाई थी।
यह मंगलमय दीक्षा समारोह पावन अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में सम्पन्न हुआ था , जहाँ संघ के करकमलों से उन्हें क्षुल्लिका १०५ वासपूज्य मति माताजी’ के नाम से दीक्षित किया गया। आज आचार्य श्री ने सम्पूर्ण संघ के सानिध्य में 'आर्यिका दीक्षा' भी दे दी।
यह क्षण सम्पूर्ण बून्दी जैन समाज के लिए अत्यंत गौरव, आनंद और आध्यात्मिक प्रेरणा का विषय है। उनका यह त्याग, तप और संयम का पावन मार्ग समस्त समाज के लिए अनुकरणीय एवं प्रेरणादायक रहेगा।
समस्त बून्दी जैन समाज की आर्यिका १०५ वासपूज्य मति माताजी सल्लेखना समाधी की ओर अग्रसर है। अनुमोदना, अनुमोदना, अनुमोदना।
संकलन कर्ता
पारस जैन 'पार्श्वमणि'
पत्रकार कोटा मो. ९४१४७६४९८०
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