सोमवार, १ डिसेंबर, २०२५

कहानी_यूज मी _डोली शाह

 


कहानी_यूज मी _डोली शाह

      

        चिपचिपाती गर्मी यूं ही परेशान कर रही थी । रात का सफर था ,  संतोष था कि  चलो कुछ थोड़ा खा पी कर आराम से सो जाएंगे, प्रातः सूरज की किरणों के साथ  तो घर पहुंच ही जाएंगे। स्टेशन में लाख ध्वनियों के बीच रेल में चढ़े ही थे कि मशीनी हवा ने दिलो  को तरोताजा कर दिया ।

          सभी अपनी -अपनी दुनिया में मस्त थे। लगभग  भोजन का वक्त हो ही चला था लोग  अपने-अपने थैले निकाल पेट पूजा की तैयारी में लगे पड़े थे।  इतने में सामने बैठी एक मोहतरमा कुछ लकड़ी जैसे हड्डियां चबा रही थी।  देखकर कुछ अजीब लगा।  तीरछी नज़रो से   देखा भी लेकिन वह भी यात्री थी आखिर! कुछ कहना शोभा नहीं देता।

       भोजन पानी से निवृत होकर मोहतरमा ने वहीं बैठक के  निचले हिस्से में अपनी थैली पटक दिया।  यहां तक की कागजी कपड़ों से ही हाथों को काम भी निपटा लिया।  उनकी कार्यवाहियां देख नजरे अपने आप में रोष प्रकट कर रही थी। इतने में मेरे मुंह से निकला " मैडम कुछ कदम आगे ही डस्टबिन है प्लीज वेस्ट मटेरियल उन में डाल दीजिए " ।

हां हां,  मैं डाल दूंगी ।

       यह सुनते ही मैं मौन हीं रह गई। मौनता में करीब घंटे बीत गये,  लेकिन जगह की वस्तु जगह में ही रह गई।  कुछ हल्की-हल्की गंध का संचार भी महसूस हो रहा था आखिर हो भी क्यों ना,  सुखी वस्तु हो तब तो उसमें तो लकड़ी जैसी हड्डी के टुकड़े तो अंडे के छिलके जो थे।  कुछ  सख्त स्वर में मैंने पुनः कहा --प्लीज़ मैडम अब तो उसे उसे डस्टबिन में डाल दीजिए! वरन् मैं कंप्लेंट कर दूंगी !

"मैंने कहा ना,  मैं डाल दूंगी, आपको इतनी टेंशन क्यों हो रही है ?" (कुछ चिड़चिड़ा सा स्वर आया)

     इतना सुनते ही मैं मौनता के साथ मन ही मन सोचती रही । इतनी सुंदर,  इतनी गोरा चुपड़ा बदन,  इतनी अच्छी अंग्रेजी और हरकतें,  दो कौड़ी के!

       इतने में काले  कोट वाले पर नजर पड़ते ही  मैंने शिकायत के तौर पर  उन्हें सब कुछ  मंद स्वर में कहा।

        मैडम वह थैला आप डस्टबिन में डाल दीजिए। काले कोट वाले साहब ने आदेश दिया।    

    उसके बाद भी वह कुछ अडी ही रही।  सभी के टिकट की जांच भी हो गई।

मैंने  पुनः कहा--- सर जी!

"अरे मैंडम ,  डस्टबिन ज्यादा दूर नहीं है ,आप पहले फेंक दीजिए।" काले कोट वाले साहब ने पुनः शखती से आदेश दिया।

     जानती है,  आप जैसे लोगों के कारण ही हमारे देश की प्रकृति का यह हशर हुआ है,  लोगों  को सांस लेने तक की शुद्ध हवा नहीं मिल पा रहा है । काले कोट वाले साहब ने व्यंग्य के स्वर में कहा ।

     अब तो मानो  उस थैली को छूना  मोहतरमा के स्वाभिमान पर करारा तमाचा लग  रहा था।   सर मैंने कहा ना ---"मैं फेंक दूंगी" !(गुस्से में आग बबूला )

    मैडम प्लीज, अभी फेंक दीजिए । पूरी हवा को प्रदूषित कर फिर उसे साफ करने की बात,  इससे बड़ी बेवकूफी और क्या होगी?  इतना कहते ही काले कोट वाले साहब मुस्कुरा कर  उनकी ओर निहारते ही रहे।  यही हाल तो गंगा का हुआ है , सारी गंदगी उसमें डालकर आज सफाई के सौ इंतजाम किए जा रहे हैं ।

      इतना सुनते ही  मोहतरमा  गुस्से से तम तमाते  हुए थैली को उठाकर डस्टबिन की ओर बढी ही थी।  काले कोट वाले साहब  के साथ सभी के चेहरे पर  हल्की सी मुस्कुराहट   छा गई...।

_ डोली शाह

निकट पी एच ई

पोस्ट -सुलतानी छोरा

जिला -हैलाकांदी

असम-788162

मोबाइल-9395726158

मेल-shahdolly777@gmail.com

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत:

टिप्पणी पोस्ट करा

खरा तो एकची धर्म, जगाला प्रेम अर्पावे....सौ. मनीषा विशाल सोन्नेकर

      मनुष्य हा देखील एक प्राणीच. मात्र, इतर प्राण्यांपेक्षा अतिशय हुशार व तर्कबुद्धी असलेला आणि चांगल्या विचारविनिमयाची कास धरणारा प्राणी. ...