रविवार, २४ मे, २०२६

राजस्थानी की मान्यता की व अकादमियों की बहाली की मांग

  

शब्दशिल्प/डेह (राजस्थान)_अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संस्थापक लक्ष्मणदान कविया  एवं  संभागीय महामंत्री पवन पहाड़िया ने संयुक्त रूप से ग्यापन लिख ( क्रमांक 5462 )  प्रदेश की उप मुख्यमंत्री  दीयाकुमारी से राजस्थानी भाषा को प्रदेश में द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिलाने की पुरजोर मांग दोहराई है ।

      ज्ञापन में लिखा कि राजस्थानी भाषा प्रदेश की प्रतीक एवँ 16 करोड़ नागरिकों की मातृभाषा है । साहित्यिक दृष्टि से राजस्थानी विश्व की तेरहवीं  एवं भारत की तीसरी समृद्ध भाषा है । इसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है । ऋग्वेद काल में सरस्वती नदी सभ्यता की  मरुभाषा  के नाम से यह लोक भाषा रह चुकी है । आजादी से पहले प्रदेश की कई रियासतो की यह राज - काज की भाषा रह चुकी है । इतना ही नहीं ब्रिटिश शाशन काल में इंडियन इम्पीरियर गजेटर 1901 के अनुसार शाशन एवं प्रशाशन में नोकरी करने वालों के लिए राजस्थानी भाषा की जानकारी जरूरी कर रखी थी । राजस्थनी भाषा के संस्कारों के स्वरूप यहां के सपूतों नें देश एवं विश्व स्तर पर हर क्षेत्र मे अपनी छाप छोड़ी है ।

 आजादी के समय हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए राजस्थान प्रदेश वासियों नें अपनी मातृभाषा राजस्थानी की कुर्बानी दी जिसके दुष्परिणाम स्वरूप आज तक हमारी मातृभाषा कानूनी मान्यता की मोहताज है । 25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधान सभा ने सर्व सहमति से राजस्थानी भाषा को  संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का संकल्प पारित करके  केंद्र सरकार को भेज दिया गया था । ततपश्चात राजस्थान सरकार की और से  समय समय पर अब तक 16 पत्र लिखे जा चुके हैं लेकिन केंद्र सरकार का बहाना है कि जब तक राजस्थानी भाषा को राजस्थान सरकार द्वितीय राजभाषा का दर्जा नहीं देती है तब तक इस मुद्दे पर केंद्र सरकार कोई विचार नहीं करेगी ।

 हाळ ही में सुप्रीम कोर्ट ने भाषाई ऐतिहासिक निर्णय देते हुए राजस्थानी भाषा को राजस्थान में  शिक्षा पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करने का निर्णय सुनाया है । इससे राजस्थानी का पक्ष और मजबूत होगा ।

प्रदेश में राजस्थानी को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने  में राजस्थान सरकार को  कोई अड़चन नहीं है । यह सारा मुद्दा सरकारी इच्छा पर निर्भर है ।

अतः आपसे आग्रह पूर्वक अनुरोध  है कि राजस्थानी भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिलाने के मार्ग को प्रशस्त करने का श्रेय एवं प्रेय कार्य करावें साथ ही प्रदेश की ठप्प पड़ी साहित्यिक अकादमियों को बहाल करने का निर्णय लेकर साहित्य जगत को अनुग्रहित करावें ।


प्रेषक -- पवन पहाड़िया

डेह, नागौर, राजस्थान

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